आज  के  इस  भौतिक   युग  में  लोगो  ने  पंचकर्ण  के  नाम  से  दुकाने  खोल  रखी  हैं   और  भुट्टोः  ऐसी  दुकाने  मस्सगे  सेंटर  के  नाम  से  बदनाम  हो  चुकी  हैं . वे  और  वह  जाने  वाले  व्यक्ति  यही  समझते  हैं  की  भाप  लेना  मस्सगे  करना   अनिमिआ  लेना  ही  पंचकर्मा  हैं   की  लेकिन  वोह  यह  नहीं  जानते  की  इससे  रोग   घटते  नहीं  बढ़ते  हैं . किसी  भी  क्रिया  को  शुरू  करने  से  पहले  हमे  रोगो  की  परिकरती , देश , कल  और  समय  और  रोग  और  रोगी  का  बाल  जानकर  ही  पूर्वो  करम ( सनेह  और  स्वादें ) के  परिस्चत  ही  पंचकर्मा 

 

में  वमन , विरचन , निरुहं , अनुवासन , शिरू  विरचन (नस्य ). वास्तव  के  कोई  भी  चिकित्सा  शुरू  करने  से  पहले  दर्शन , स्पर्शन  और  पर्सन  इस  तीन  प्रकार  के  विधियों   को  परियोग  करके  और  रोग  की  पहचान  करके  उसे  करना  चाहिए  ताकि  इनसे  लाभ  मिले

 

 

शरीर  में  आहार  जमने  रोग  जोह  शारीरिक  और  मानसिक  विधिया  पैदा  करते  हैं  उनको  उनसे  दूषित  हुए  धातुओं  से  दोषो  को  निकलने  के  लिए  पंचकर्मा  अत्ति  उत्तम  हं  लेकिन  हम  पंचकर्म  करने  से  पहले  पूर्व  करम  सनेह -स्वादें  के   ओकरा  ांनिवारिया  हं  क्युकी  स्नेहन  से  और  स्वादें  से  धातुओं  में  जोह  माल  दृश्य  होते  हैं  वोह  कोष्ठो  में  आजाते  हैं  उन  मालो  और  दृश्यों  को  कोष्ट  भाव  से  भर  निकलने  के  लिए  ववन ( कुघ  दोष ) विरचन (पिट  दोष ) निरुहं  बस्ती  और  अनुवासन  बस्ती  वाट  दोषो  को  माल  द्वार  के  द्वारा  भर  निकला  जाता  हैं  और  सिरु  विरेचन ( ऊर्द्ध्वय  जत्रुगत  रोगो  को  नाशी  द्वारा  भर  किया  जाता  हैं  इस  तरह  से  अगर  पंचकर्मा  को  पूरा  समय  और  शांत  चित्र  रहते  हुए  किया  जाये  तोह  बेहनकर  से  बेहनकर  ासधते  रोग  को  समूल  नष्ट  किया  जा  सकता  हं .

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